खेल-खिलाडी

मोबाइल की आभासी दुनिया में मलखम्ब जैसे खेल कहीं लुप्त न हो जाएं!

वह भी क्या दिन थे जब शाम होते ही मोहल्लों की छोटी छोटी सडकें शोर से गूंजती रहती थी। ऐसा कोई पार्क नहीं होता था जहाँ बच्चों की टोलियाँ नहीं दिखती थी! खोखो, ताड़म ताड़ी, छिपम-छिपाई, गुल्लीडंडा, बाघ-बकरी, रस्सीकूद, पिट्ठू, लंगड़ी टांग, कंचे, लट्टू क्या...