हिंदी कविता रोटियां – कवि प्रशांत
अजीब दास्तान हैं दोस्तों मेरे हिन्दुस्तान की कोई फेंक देता हैं खाना बेकार समझकर कचरें में तो किसी को एक पल के खानें में दो "रोटियां" भी नसीब नहीं एक तरफ शादियों में हो रही हैं खाने की बर्बादी दुसरी तरफ भूखी मर रही हैं...




