बचपन को खिलने दो, फूलों को हंसने दो।
बचपन के दिन, मस्ती के दिन, नाचते गाते, बिन बात हंसते झूमते खिलखिलाते। किसको अपना बचपन याद नहीं आता। पर आजकल बच्चों का बचपन कहीं खोता जा रहा है। बच्चों पर बहुत ही जल्दी जिम्मेदारियां का बोझ बढ़ रहा है। संयुक्त परिवार के परंपरा विलुप्त...







